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Padmā ekādaśī

The narration of padmā ekādaśī
Translation from Hindi by Krunal Makwana

yudhiṣṭira asked: O Keshava, please describe to me regarding the ekādaśī which occurs in the white half of the month bhādrapada.What is this ekādaśī’s name, the presiding deity and the rituals to be performed?

śrī kṛṣṇa replied: O King, on this issue I shall narrate an interesting conversation between Lord Brahma and Sage Narada.

Sage Narada asked: O four faced one (Lord Brahma), my obesciences to you. For my penance of invoking Lord Visnu, I would like to learn from you regarding the ekādaśī which occurs in the white half of the month bhādrapada?

Lord Brahma replied: O best among Sages and following the path of vaishnavism, you have asked a pertinent question. In the white half of the month bhādrapada the ekādaśī is named ‘padmā‘. On this day rituals are performed to Lord Hrishikesh, and it’s observance should surely be performed.

In the lineage of the solar dynasty, there was once a great emperor named Mandhata, who with his children ruled their kingdom with righteousness.  His citizens where fearless and suitably wealthy with no unforeseen deaths, no one suffering from mental anxiety or disease throughout the kingdom. All wealth of the King and citizens alike was accumulated rightfully and following Dharma. The citizens following their respective caste and stage of life [1], where extremely happy. The Kingdom and land of King Mandhata seemed only parralel to Kamadhenu [2].

One time however due to some misgivings of previous karma, the Kingdom suffered a drought for three years with the citizens becoming extremely sorrowful and suffering from hunger approached the King.

The Citizens said: O great King, please listen to our words. In the ancient times, the great sages named water ‘naara’, and this ‘naara’ is the residing place (ayana) of the Lord and hence the Lords name is Narayana. In the form of Narayana, Lord Visnu pervades all creation. He is the Lord who takes the form of clouds to shower rain, from rain comes food and from food we gain longevity. O great king, currently without food, we are diminishing, therefore please do something.

The king said: Your words are correct, food is ‘Brahman’ [3], as through food life is born and life depends on food. Through historical and puranic tales there are detailed narrations where due to the Kings misgivings the Kingdom had to suffer. However even after long contemplation I cannot remember any actions which I have done that would have incurred sin, however I will still attempt to try and remember.

With this in mind, the King and a few close associates after offering their prostrations to the Lord, left for the forest named ‘Saghan’, where they went to many hermitages of great Sages and Saints. One day they met Sage Angiraa [4], with clasped and attempting to contain his excitement Mandhata prostrated to the Sage. The sage in return replying ‘Swasti’ [5] asked him of his and his Kingdoms welfare. However at this moment the King feeling it not  appropriate to discuss the matters pertaining to the Kingdom replied his own welfare and then asked the welfare of the Sage.

Sage Angira welcoming Mandhata and his entourage into his ashram offered them all a seat, drink and food. At an appropriate time the Sage asked the King for the cause of his visit.

The king said: O Lord, with the principles of Dharma I have been practising my Kingship, however for some reason my Kingdom is suffering from a drought. What could be the reason for this as I just cannot understand what I have done?

The Sage said: O King, of all ages, this age of ‘Sat’ [6] is the greatest. In this age all people contemplate on the Lord, and therefore Dharma currently is standing on all four feet [7] . However in this age, only Brahmanas and none other are allowed to perform austerity but in your kingdom you currently have one shudra performing austerity. For this reason you are suffering a drought, resolve this shudra from doing so and this offence will be absolved.

The king said: O Sage, for one he is performing austerity and secondly he is innocent and therefore I will not hinder his practise, please tell me an alternative of how I can absolve this sin?

The Sage said: O King, if this be your stance then you must perform a fast on ekādaśī. In the white half of the month bhādrapada there is an ekādaśī named padmā. By observing this fast you shall surely be absolved of the sin and there will surely be rain. O King, observe this fast with your citizens and family members.

Hearing the words of the Sage, the King returned home and with all the citizens and his family members observed the fast on the white half of the month bhādrapada named padmā ekādaśī. Following the fast the rain started, ending the drought, misery of the citizens and exemplifying the benefits of observing the padmā ekādaśī.

śrī kṛṣṇa said: O King yudhiṣṭira, therefore this pious and great observance should surely be done. On the day of padmā ekādaśī, the following should be given to a pious brahmin, a pot of water covered by a cloth, yoghurt, rice, umbrella and shoes. Whilst donating the following chant should be recited:

namo namaste govinda budhaśravaṇasaṁjaka ||
aghaughasaṁkṣayaṁ kṛtvā sarvasaukhyaprado bhava |
bhaktamuktipradaścaiva lokānāṁ sukhadāyakaḥ ||

My obsciences to Govinda who is associated with tuesdays, planetary śravaṇa on the twelth day named budhaśravaṇa. May you remove all my sinful affects and grant me happiness. Obesciences again to the provider of happiness to the elevated souls and the granter of liberation

O King yudhiṣṭira, those who read or listen to this narration are freed from all their sinful actions.

युधिष्ठिर ने पूछा: केशव ! कृपया यह बताइये कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है, उसके देवता कौन हैं और कैसी विधि है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूँ, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद से कहा था ।

नारदजी ने पूछा: चतुर्मुख ! आपको नमस्कार है ! मैं भगवान विष्णु की आराधना के लिए आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

ब्रह्माजी ने कहा: मुनिश्रेष्ठ ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । क्यों न हो, वैष्णव जो ठहरे ! भादों के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पद्मा’ के नाम से विख्यात है । उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा होती है । यह उत्तम व्रत अवश्य करने योग्य है । सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि हो गये हैं । वे अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया करते थे । उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था । उनकी प्रजा निर्भय तथा धन धान्य से समृद्ध थी । महाराज के कोष में केवल न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था । उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे । मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देनेवाली थी । उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत सुख प्राप्त होता था ।

एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी । तब सम्पूर्ण प्रजा ने महाराज के पास आकर इस प्रकार कहा :
प्रजा बोली: नृपश्रेष्ठ ! आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए । पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नार’ कहा है । वह ‘नार’ ही भगवान का ‘अयन’ (निवास स्थान) है, इसलिए वे ‘नारायण’ कहलाते हैं । नारायणस्वरुप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापकरुप में विराजमान हैं । वे ही मेघस्वरुप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है । नृपश्रेष्ठ ! इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अत: ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो ।
राजा ने कहा: आप लोगों का कथन सत्य है, क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत जीवन धारण करता है । लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, किन्तु जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता । फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करुँगा ।
ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले, विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये । वहाँ जाकर मुख्य मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे । एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अंगिरा ॠषि के दर्शन हुए । उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्ष में भरकर अपने वाहन से उतर पड़े और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनि ने भी ‘स्वस्ति’ कहकर राजा का अभिनन्दन किया और उनके राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । राजा ने अपनी कुशलता बताकर मुनि के स्वास्थय का समाचार पूछा । मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया । उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बैठे तो मुनि ने राजा से आगमन का कारण पूछा ।
राजा ने कहा: भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणाली से पृथ्वी का पालन कर रहा था । फिर भी मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया । इसका क्या कारण है इस बात को मैं नहीं जानता ।
ॠषि बोले : राजन् ! सब युगों में उत्तम यह सत्ययुग है । इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं तथा इस समय धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता है । इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं । किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते । तुम इसके प्रतिकार का यत्न करो, जिससे यह अनावृष्टि का दोष शांत हो जाय ।
राजा ने कहा: मुनिवर ! एक तो वह तपस्या में लगा है और दूसरे, वह निरपराध है । अत: मैं उसका अनिष्ट नहीं करुँगा । आप उक्त दोष को शांत करनेवाले किसी धर्म का उपदेश कीजिये ।
ॠषि बोले: राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशी का व्रत करो । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो ‘पद्मा’ नाम से विख्यात एकादशी होती है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी । नरेश ! तुम अपनी प्रजा और परिजनों के साथ इसका व्रत करो ।
ॠषि के ये वचन सुनकर राजा अपने घर लौट आये । उन्होंने चारों वर्णों की समस्त प्रजा के साथ भादों के शुक्लपक्ष की ‘पद्मा एकादशी’ का व्रत किया । इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से आप्लावित हो गयी और हरी भरी खेती से सुशोभित होने लगी । उस व्रत के प्रभाव से सब लोग सुखी हो गये ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! इस कारण इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए । ‘पद्मा एकादशी’ के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढकँकर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए, साथ ही छाता और जूता भी देना चाहिए । दान करते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए :
नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक ॥
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥
‘बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करनेवाले भगवान गोविन्द ! आपको नमस्कार है… नमस्कार है ! मेरी पापराशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा सुखदायक हैं |’
राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।

[1] Varnashram Dharma
[2] A Puranic wish fulfilling cow
[3] The supreme spirit
[4] A son of Brahma
[5] An auspicious greeting
[6] There are four ‘ages’: Satyuga, Tretayuga, Dvaparyuga and Kaliyuga
[7] Satya, Tapa, Pavitrataa, Daya (Truth, Austerity, Purity, Compassion)


About Makwana

A student of Sanatan Vedic Dharma


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